
पूज्य स्वामी श्री प्रेमानंद जी महाराज के चरणों में समर्पित
अट्ठासी हजार ऋषियों की तपस्थली परम तीर्थ नैमिषारण्य, गंगा-यमुना-सरस्वती जैसी पवित्र नदियों की मिलन-स्थली तीर्थराज प्रयागराज, श्री राम की जन्म-स्थली अयोध्या, श्री कृष्ण की प्राकट्य-स्थली मथुरा एवं जहाँ प्रेमानन्द गोविन्दशरण महाराज जी जैसे संतों की आविर्भूत-स्थली — उत्तर प्रदेश भारतवर्ष का प्राण है, जहाँ स्वयं प्रभु ने धरणीधरण होकर धरा को अभिभूत किया है।
उच्च ब्राह्मण कुल में जन्मे, कानपुर जिले के सरसौल ब्लॉक के अखरी गाँव में ३० मार्च सन् १९६९ को पूज्य संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के बचपन का नाम ‘ अनिरुद्ध पांडे’ था। धार्मिक प्रवृत्ति और भक्तिमयी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें अध्यात्म की ओर प्रेरित किया, और मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में उन्होंने घर त्याग कर वाराणसी की ओर प्रस्थान किया। यहीं से उनके जीवन की अविराम यात्रा अनवरत गतिमान है।
जीवन और मोक्ष को अंगीकार करती हुई पावन भूमि ‘काशी’ में, श्रद्धेय गुरुदेव ने जब भागीरथी के चरण पखार कर वल्कल वस्त्रों में पतितपावनी गंगा से आशीष लेकर ज्ञान के गोते लगाए, तब शायद किसी को ज्ञात नहीं होगा कि ठिठुरती ठंड में प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या स्नान करने वाला, जीवन के झंझावातों से जूझकर, यह सन्यासी कल भविष्य का योद्धा बनेगा — जिसके दर्शन मात्र से उत्कंठा मनुष्य की मनुहार बन जाएगी।
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मंदाकिनी के तट पर ईश्वर की आराधना के मध्य ईश-ध्यान में मग्न गुरुदेव को, एकाएक एक सन्यासी द्वारा ‘प्रभुदर्शन’ की लालसा ने, महारास की ज्योतिर्मय छवि गुरुदेव के लिए एक ‘चिंतामणि’ बना दी। गोवर्धन का दर्शन, कालिन्दी का तट, वंशीवट, मानसरोवर, कुंज-गलियाँ, निधिवन की दिव्यता, राधारमण की अठखेलियाँ और ‘वेणु माधुरी’ के मध्य पूज्य — गुरुदेव को जब ऊँची अटारी के दर्शन की अभिलाषा जागृत हुई, तब ‘ त्रिलोकशोकहारिणी किशोरी ‘श्री राधे’ ने पथ के कंटकों को दूर करते हुए ‘विधाता’ से उनके दीर्घायु होने की श्री वंदना की।
आकाशवृत्ति पर जीवित रहने वाले संत, जब श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज’ के सान्निध्य में आए, तब रसिक-संत से विभूषित होकर उन्होंने श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय में सम्मिलित कर, निज मंत्र और सहचरी भाव की दीक्षा दी। जिनकी प्रेरणा से इन्होंने श्रीहित राधा केलि कुंज की स्थापना कर ‘नाम जप’ की महिमा को जन-मानस तक पहुँचाकर, श्री राधा-नाम-धुन को जन-जन में प्रचारित किया।
सांसारिक आडंबरों से दूर राधा-नाम की करतल का कोलाहल जब गुरुदेव के अधरों तक जाकर श्री जी की उपस्थिति का आभास कराता है; आराधना जब बहुलावन विहार करते हुए गिरिराज जी के दर्शनों की पिपासु होकर, पीली पोखर में हस्त-प्रक्षालन करके राधा कुण्ड के दर्शन को निहारने के लिए लालायित रहती है; तब गहवर वन में कृष्ण के आकांक्षा रासेश्वरी के नूपुरों की झंकार गुरुदेव के हृदय के तारों को झंकृत करती है, और ‘प्रिया-प्रियतम’ की उपस्थिति को दर्शाती है।
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